कलयुग में 'सतयुग' का अहसास: न बिजली, न स्मार्टफोन; डॉक्टर-इंजीनियर करियर छोड़ मिट्टी के घरों में जी रहे 60 लोग, खुद उगा रहे अपना अनाज

कलयुग में 'सतयुग' का अहसास: न बिजली, न स्मार्टफोन; डॉक्टर-इंजीनियर करियर छोड़ मिट्टी के घरों में जी रहे 60 लोग, खुद उगा रहे अपना अनाज

कलयुग में 'सतयुग' का अहसास: न बिजली, न स्मार्टफोन; डॉक्टर-इंजीनियर करियर छोड़ मिट्टी के घरों में जी रहे 60 लोग, खुद उगा रहे अपना अनाज

विदिशा: 21वीं सदी की भागदौड़ और डिजिटल दुनिया से कोसों दूर, मध्य प्रदेश के विदिशा (गंजबासौदा से 28 किमी दूर बड़वासा गांव के पास) में एक ऐसी दुनिया बसी है जो आज के दौर में किसी अजूबे से कम नहीं लगती। साल 2021 में इस्कॉन से जुड़े 'भक्तिग्राम ट्रस्ट' द्वारा स्थापित इस गांव में करीब 60 लोग बिना बिजली और बिना मोबाइल के पूरी तरह वैदिक जीवनशैली अपना चुके हैं।

मिट्टी और खपरैल से बने 12 घरों वाले इस भक्तिग्राम में शाम ढलते ही दीये और लालटेन जल उठते हैं। आधुनिक सुख-सुविधाओं को त्यागने वालों में कोई आम इंसान नहीं, बल्कि बड़े शहरों की चकाचौंध छोड़कर आए डॉक्टर और टेक्सटाइल इंजीनियर जैसे उच्च शिक्षित पेशेवर शामिल हैं। पूरे गांव में केवल दो सामान्य की-पैड फोन हैं, जिनका उपयोग भी सिर्फ बाहर के संपर्कों के लिए सीमित रखा गया है।

गांव में रसोई भी पूरी तरह पारंपरिक है—न गैस चूल्हा और न ही मिक्सी। चूल्हे पर लकड़ी और कंडों से खाना पकता है, सिल-बट्टे पर मसाले और हाथ की चक्की से आटा पीसा जाता है। बैल से चलने वाले पारंपरिक कोल्हू से तेल निकाला जाता है और खेतों में बिना किसी केमिकल या खाद के 100% जैविक अनाज व सब्जियां उगाई जाती हैं। इसके अलावा, गौशाला में गुजराती नस्ल की गायों का दूध सिर्फ जरूरत भर लिया जाता है, बाकी बछड़ों के लिए छोड़ दिया जाता है।

गांव के बच्चे धोती-कुर्ता पहनकर गुरुकुल में शिक्षा लेते हैं और छोटी सी उम्र में फर्राटेदार संस्कृत श्लोक बोलते हैं। यहां बसने का नियम भी बेहद कड़ा है—सात महीने के तीन-चरणीय कड़े इम्तिहान के बाद ही किसी परिवार को यहां स्थायी रूप से रहने की अनुमति मिलती है। ग्रामीणों का कहना है कि मशीनों और स्क्रीन से दूर रहकर उन्हें जीवन का असली सुकून मिल रहा है।